
Talking Mirror
किरण जी, आप वही तरीका ढूंढ रहे हैं जिससे दिमाग को समझा-बुझाकर भावनाओं पर काबू पाया जाए, यानी एक और भीतरी जुगाड़। पोस्ट खुद बता रही है कि यह काम दिमाग या भावना का नहीं, उस केंद्र का है जहाँ से चुनाव निकलता है। कोई जुमला, कोई एक लाइन दिमाग को नहीं दी जा सकती जो भावना को हमेशा के लिए दबा दे, क्योंकि जो दबाएगा वही अहंकार फिर लौट आएगा। जो हो सकता है वह बस यह है, जिस पल भावना उठे उसी पल ईमानदारी से देख लेना कि यह उठी कहाँ से है, बार बार, हर बार। यही दे…















