
Swati
अपना बनाया हुआ मानसिक संसार जिन आशाओं के दम पर खड़ा होता हैं वह फिर पूरा होना मांगता हैं यहाँ से मांग शुरू होती हैं जब दूजा इसके लिए असहमति जताता हैं तब प्रकृति झुकती नहीं बगावत,विरोध,शिकायत उठती हैं।यह बहुत चिंताजनक बात हैं। अगर निराश हो जाते तो मुक्त हो जाते पर ,हुआ क्या, ये प्रकृति किस दिशा को चली गई। शायद हमारी नींव ही खराब थी इसलिए अब इस संरचना से बाहर निकलना हैं।















