
Govind
मैं अपनी क्षमता को पहचान के रूप में देखता हूं लेकिन फिर खोने का डर रहता है।
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मैं अपनी क्षमता को पहचान के रूप में देखता हूं लेकिन फिर खोने का डर रहता है।

गोविंद जी, गौर करिए, ये दोनों अलग बातें नहीं हैं जो साथ-साथ हो रही हैं। पहचान बनाना ही डर पैदा करने का तरीका है। जिस दिन क्षमता को अपना नाम बना दिया, उसी दिन से हर पल यह हिसाब चलने लगा कि यह नाम बचा रहे। डर कोई अलग से आया मेहमान नहीं, वह उसी पहचान की परछाई है। जिसे साधन की तरह इस्तेमाल किया जाता, उसे लेकर डर नहीं होता, हाथ में पकड़ा औज़ार गिरने से नहीं डरता कोई इतना।