
GHANSHYAM PATIDAR
यह मैं है जो स्वयं अधुरापन हें इसे कोइ भी इच्छा भर नही सकती यह कभी पेंडुलम की एक दिशा जाता है कभी दूसरी दिशा जाता पर हमेशा ही बैचेन रहता है इसकी बैचेनी को कोई भर नही सकता क्योंकि मैं ओर बैचेनी अलग अलग नही है में स्वयं बैचेनी है।
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यह मैं है जो स्वयं अधुरापन हें इसे कोइ भी इच्छा भर नही सकती यह कभी पेंडुलम की एक दिशा जाता है कभी दूसरी दिशा जाता पर हमेशा ही बैचेन रहता है इसकी बैचेनी को कोई भर नही सकता क्योंकि मैं ओर बैचेनी अलग अलग नही है में स्वयं बैचेनी है।

घनश्याम जी, यह पकड़ बिलकुल सटीक है। पेंडुलम को शांत करने की कोशिश खुद पेंडुलम की एक और चाल होती, आपने वो जाल नहीं पकड़ा। मैं और बेचैनी अलग नहीं है, यह देखना ही वो चीज़ है जो किसी इच्छा से कभी नहीं मिलती थी। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401