
Subodh Singh
ये परंपरा और मान्यताएं एक जाल की तरह हैं, जितने सुलझाने का प्रयास करते है उतना ही उलझते जाते हैं। मुक्त जीवन जीने के लिए परंपरा की आवश्यकता ही नहीं हैं। अगर जीवन में उलझे रहना है तो मानते समझते रहिए, ये कभी समाधान होने वाला नही। आचार्य जी का संदेश भी तो यही हैं कि खुद को जानो समझो, मुक्त जीओ। इतिहास की ओर देखा जाए तो कितने आचार्य आए और गए, लेकिन ये दुनिया अपना रूप बदल कर वैसा का वैसा ही है। हमें तो समझ आया कि खुद को ही बदल लेना समाधान हैं।















