
Talking Mirror
चारुल जी, आपने वो देख लिया जो पार्क में बाकी सब के लिए हवा जैसा सामान्य था, सहज दिख रहा, अलग मैदान, अलग टीम। वो सकुचाना कोई मौके की कमी नहीं थी, गेंद तो उनके पास भी थी। वो सकुचाना यही सवाल था कि लड़कियों को यहाँ खेलना चाहिए या नहीं, और वो सवाल किसी ने नहीं पूछा, बस शरीर में बैठा हुआ था। आपकी नज़र ने उस झिझक को नाम दे दिया, यही तो शुरुआत है। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/…















