
Geeta
भीतर एक इच्छा उठती है कि लोग हमारी प्रशंसा करें और हमें अच्छा मानें। यह केवल मान्यता पाने की चाह नहीं है। इसका स्रोत अहंकार है, और अहंकार स्वयं ही अपूर्णता है। अहंकार का अपना कोई आधार नहीं होता, इसलिए वह दूसरों की स्वीकृति, प्रशंसा और अच्छी छवि से अपनी पहचान उधार लेता है। तब सेवा भी कई बार करुणा की अभिव्यक्ति नहीं रहती, बल्कि उसी उधार की पहचान को बनाए रखने का साधन बन जाती है।















