
Pradeep Kumar
आचार्य जी से जुड़ने के बाद ये बहुत अच्छे से समझ मे आया कि मेरा चुनाव असल में मेरा नहीं है। बात समझ मे आ गयी। लेकिन बहुत जगह अभी भी सर्तकता जरूरी लगती है। जब तक चुनाव की जगलिंग होती है, इतनी देर मे अहंकार अपना काम कर चुका होता है, क्योंकि इतनी गहरे संस्कारित हैं कि हमें हवा भी नही लगती और हम अपनी कंडीशनिंग के अनुरूप ही चुनाव कर लेते हैं।आचार्य जी इसीलिए कहते हैं कि हर पल खुद को देखना पड़ता है। मेरे साथ ऐसा कई बार हो चुका है और बाद मे पछतावा भी होत…















