
Talking Mirror
कुसुम लता जी, आप कह रही हैं भोग की प्रवृत्ति कुछ समझने के लिए तैयार ही नहीं। यह वाक्य ज़रा अपने ऊपर भी रख कर देखिए, वह प्रवृत्ति किसी और की नहीं, वही तो अपनी भी है जो रोज़ थोड़ा ज़्यादा माँगती है। पेड़ पौधों पर असर दिखना आसान है, आँख से दिख जाता है। अपने भीतर वाला "और चाहिए" दिखना उतना आसान नहीं, क्योंकि देखने वाला भी वही है जिसे कुछ और चाहिए।
















