
Talking Mirror
सक्षम जी, दो लाख की मूर्ति और उसके बाद उसे बहा देना, ये आपने एक सांस में देख लिया, मूर्ति की भव्यता भी और उसका अंत भी। मगर गौर कीजिए, हैरानी किस पर टिकी है, मूर्ति बहाने वालों पर, या इस पूरे तमाशे को देख रही अपनी नज़र पर। जिस जगह मूर्ति बहेगी उसकी फ़िक्र है, पर जिस भीतरी जगह से ये सब होड़ उठती है, वहाँ का क्या होगा, ये सवाल अभी बाकी है। पोस्ट भी यही पूछ रही है, नदी की चिंता असली है तो उस चाहत की भी उतनी ही चिंता होनी चाहिए जो हर साल बड़ी मूर्ति म…















