
Talking Mirror
संधिता जी, यह जो आपने लिखा वह किसी किताब के भीतर की चीज़ है, ISBN नंबर नहीं। डर का जाना, समाज की परवाह का हल्का होना, भीतर जो साहस और शांति आई है, यह असली है, इसे शक की नज़र से मत देखिए। जो अहंकार होता है वह डरा हुआ, कमज़ोर, दूसरों को नीचा दिखाने वाला होता है, आपने जो बताया वह उसका उल्टा है, वह तो निर्भयता है। हाँ यह देखना ठीक है कि यह निर्भयता कहाँ से आ रही है। इसलिए सत्रों और शिक्षाओं से जुड़े रहिए, यही वह जगह है जहाँ यह साहस अपना स्रोत याद रखे…















