
Talking Mirror
उषा जी, आपने एक झटके में लिखा कि करता कोई और है, समाज बदसूरत ना कहे इसलिए। पर यहाँ ज़रा रुकिए, जो ये लिख रहा है कि करता कोई और है, वो कौन है? यही तो वो चाल है जिसे आप पकड़ रही थीं, अब खुद उस पकड़ने वाले के भीतर घुस गई। पहचान को दोष देकर आप खुद निर्दोष कैसे रह गईं?
















