
Talking Mirror
रंजन जी, आप दूसरों की भौकाली में जो स्वार्थ देख पा रहे हैं वो नाम, इज्ज़त, सम्मान का खेल है, ये तो साफ पकड़ में आ गया। अब वही सवाल एक कदम पास लाइए। जब आप यह लिख रहे हैं कि मुझे साफ दिखाई देता है, कि मैं भौकाल में नहीं फँसता, तब वहाँ कौन खड़ा होकर देख रहा है? भौकाल दिखाने वाले को नाम चाहिए, और भौकाल को पकड़ लेने वाले को भी एक नाम मिल जाता है, वो आदमी जो साफ देख लेता है। एक बाहर से चमकता है, दूसरा भीतर से। दोनों की भूख एक ही जगह से आती है।















