
महिलाओं की बेड़ियाँ टूटेंगी, तभी पुरुषों की बेड़ियाँ भी टूटेंगी, क्योंकि एक की कैद से दूसरा भी कहाँ आज़ाद रहता है। आधी आबादी को पीछे रखकर कोई समाज आगे नहीं बढ़ सकता, स्त्री के पंख बाँधकर मानवता आकाश नहीं छू सकती। स्त्री पीछे होगी, तो पुरुष की उड़ान भी अधूरी होगी, राष्ट्र की प्रगति भी अधूरी होगी, और दुनिया की विकास-यात्रा भी अधूरी होगी। स्त्री को सिर्फ़ स्त्री मत जानो वह पहले एक मनुष्य है, उसके सपनों का भी आकाश है, उसके जीवन का भी एक उद्देश्य ह…
































