
Dhanjeet Kumar
रोंगटे खड़े होने की यह शारीरिक प्रक्रिया केवल एक जैविक क्रिया नहीं, बल्कि हमारी भीतर की सजी हुई चेतना का एक जीवंत एहसास है। जब मैं एकांत में खुद को देखता हूँ और अपनी ही चेतना से संवाद करता हूँ, तो इस सूक्ष्म अनुभूति की गहराई का अनुभव होता है। परंतु जीवन की व्यस्तता और बाहरी दुनिया के शोरगुल में, हम अक्सर इतने उलझ जाते हैं कि शरीर की इन अंदरूनी प्रतिक्रियाओं और अपनी ही रूह की आवाज़ से अनजान रह जाते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि बाहरी कार्य-व्याप…















