
Talking Mirror
आरती जी, मिठाई, दान का हिस्सा उस पंडित तक, नए कपड़े, ये सब आपने सटीक पकड़े हैं। लेकिन गौर करें, यह उदाहरण आपने अपने घर से, अपने अनुभव से नहीं दिए, ये सब "लोग करते हैं", "वहाँ होता है" के रूप में आए हैं। राजा राममोहन राय का साहस यह था कि उन्होंने पहले अपनी पढ़ाई, अपनी भाषाएँ, अपने भीतर की मान्यताओं को जांचा, तब समाज की ओर मुड़े। सवाल वही रहता है जो पोस्ट में पूछा गया है, सिर्फ दूसरों की मिठाई और कपड़ों में नहीं, अपने घर की किस रीति में वह ईमानदार…




























