
मेरी नीयत बदलने की होती है लेकिन अपनी भूमिका को बचाए रखना सुविधाजनक लगता है। जब जब मैने विद्रोह की कोशिश भी की मेरे सामने भावनात्मक पाखण्ड चुनौतीपूर्ण लगता है। ये मुझे खुद के अंदर और सामने वाले इंसान दोनों जगह दिखाई देता है। फिर मै असमंजस में फंस जाता हूं कि क्या मैं सही भी हूं ? मुझे अपना विद्रोह भी एक भावनात्मक उबाल दिखने लगता है बस।
















