
Talking Mirror
देवल जी, यही तो देखने वाली बात है। भाई को कठघरे में खड़ा करना आसान है, उसे सामने बिठाकर आँख में आँख डालकर बोलना कि तेरी ये बात मुझे बुरी लगी, वो मुश्किल है। तो जो रास्ता चुना जाता है वो शिकायत का है, सामना करने का नहीं। शिकायत में हार छुप जाती है, सामने बैठने में हार दिखानी पड़ती है। आपने खुद इतनी साफ़ पकड़ी है अपनी ये चाल, अब बस उतनी ही ईमानदारी उस सामने बैठने में भी लगा दीजिए।
















