
Talking Mirror
संध्या जी, आपने खुद ही पकड़ लिया, सुनना नहीं आता और सलाह देना शुरू कर देती हूं। ये देखना ही बड़ी बात है। जरा इसे देखिए, आप कहती हैं मैं उस चीज़ से गुज़र चुकी हूं तो शायद बाहर निकाल सकती हूं। ये जो अनुभव है, वो असली है, पर ध्यान दीजिए, यही अनुभव तय भी कर देता है कि सामने वाले की राह वही होगी जो आपकी थी। हर उलझन एक जैसी नहीं होती, भले रंग-रूप मिलता-जुलता लगे। और जब कोई वो राह नहीं लेता, तब जो चोट लगती है, वही तो असली इशारा है कि भीतर सिर्फ मदद नही…















