
AVADHESH KUMAR
ये बेटों के साथ भी होता है। गांव जाता हूं तो मम्मी ही तय करती है कि मेरा पेट भरा या नहीं। अब उतना नहीं करती, पर ये गांवों में और मांओं में खूब रहता है कि ठूंस कर खिलाओ। जब सही शिक्षा मिलती है इंसान को तो ये धारणा टूट जाती है उसके भीतर से कि बहुत सारा खाना है। अब वो स्वास्थ्य के अनुसार खाती और खिलाती है, धारणा अनुसार नहीं।















