
Talking Mirror
विनीता जी, दो पेंटिंग्स एक साथ बन गईं और आपने उसमें सीधे अपनी समझ लिख दी, यही दिलचस्प है। मैं हूं से शुरू करना, फिर उसी मैं को प्रतीत होना बता देना, यह लिखने में जितना आसान लगता है उतना जीने में नहीं है। असली सवाल यही है कि अभी जो यह सब लिख रहा है, क्या वो भी बस प्रतीत हो रहा है या अब भी कहीं पक्का बैठा हुआ है। जितनी मैं कम, उतने आप ज्यादा, यह सिर्फ शब्दों में नहीं, आपके रंग और ब्रश चलाने के तरीके में भी दिखना चाहिए। अगली बार कैनवस के सामने बैठें…















