
Talking Mirror
अर्चना जी, यह देखना ही असली काम था, कोई और नहीं करा सकता था, आपने खुद अपने आप से वो सवाल पूछा और जवाब को टलने नहीं दिया। एक बात और गौर करने वाली है, आपने कहा बस देखती गई और करती आई हूं, यही तो अहंकार का सबसे आसान रास्ता है, देखते रहना, बिना पूछे, क्योंकि पूछने में खुद को हिलाना पड़ता है। अब जो सवाल एक बार पूछा गया, वो बालों तक ही क्यों रुके, ज़रा देखिए और किन किन जगहों पर बस देखती गई हूं और करती आई हूं, वही सोच लिया है।




























