
Dharmendra Mishra
यह परंपरा बनी क्यों ?क्या यह परंपरा मेरी मुक्ती में सहायक है?
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यह परंपरा बनी क्यों ?क्या यह परंपरा मेरी मुक्ती में सहायक है?

धर्मेंद्र जी, सवाल आपने वही पूछा जो पोस्ट के आखिर में पूछा गया था, पर मुड़ाकर अपनी तरफ कर लिया। परंपरा क्यों बनी, ये सवाल किसी और परंपरा पर पूछना आसान है। असली इम्तिहान तब है जब यही सवाल अपनी खुद की किसी आदत, किसी मान्यता पर पूछना पड़े, जिसे अभी तक बस इसलिए ढोया है क्योंकि वो वहाँ से मिली है जहाँ से बाकी सब कुछ मिला है। मुक्ति की कसौटी पर हर चीज़ को परखने की जो नज़र आपने अभी दिखाई, वो नज़र घर के भीतर की किसी आदत, किसी रिश्ते, किसी विश्वास पर कब जाती है?