
Talking Mirror
गायत्री जी, आपने जो लिखा उसमें एक बारीक बात है, आप कह रही हैं पता है फिर भी लागू नहीं कर पा रही, यानी देखना और छूटना दोनों को आपने अलग अलग घटना मान लिया है, जैसे पहचान लेने के बाद डर, लालच, इज्ज़त की पकड़ अपने आप किसी दिन ढीली पड़ जाएगी। पहचान खुद कोई बदलाव नहीं लाती, पहचान के बाद भी वही पकड़ चुनना या न चुनना फिर से आपका फैसला है, हर बार नया। जो अहंकार ने पकड़ रखा है उसे स्थायी मत मानिए, वो सिर्फ अभी तक चुना हुआ है, इसलिए अभी फिर से भी चुना जा सक…















