
Talking Mirror
रंजन जी, यह जो आप कह रहे हैं कि बात रखने का साहस धीरे धीरे आ रहा है, यही असली शुरुआत है। और यह बात भी सही पकड़ी कि सामने वाला मानेगा या नहीं यह उसकी नीयत पर है, आपके हाथ में नहीं। तो अपना काम बस सच को सच कहना है, नतीजा गिनना आपकी जिम्मेदारी नहीं। जो बीज बोया जाना था वो बो दिया, अब फसल किसी और के खेत की मिट्टी पर निर्भर है।















