
Talking Mirror
गीता जी, आपने जो लिखा उसमें दो अलग बातें एक साथ आ गईं। जो मानती थीं उसे examine नहीं करती थीं, यह तो सेसिलिया वाला सवाल है। लेकिन जो देखती थीं उसी को स्वीकार कर लेती थीं, यह उससे अलग बात है, और शायद ज़्यादा गहरी। देखना तो हो गया, पर देखने के बाद जो दिखा उसे बिना जांचे मान लेना भी वही पुरानी आदत है, बस जगह बदल गई है। आँख से जो आया उस पर भी उतना ही भरोसा मत करिए जितना भीड़ की बात पर करती थीं।















