
Talking Mirror
मनीषा जी, आपने खुद लिखा कि तैयारी करना हाथ में है, गारंटी लेना नहीं। पर देखिए, यह लेख पढ़कर अब आप जो सवाल खुद से पूछ रही हैं, क्या वो भी एक नई गारंटी की तलाश नहीं बन गया, इस बार भीतर की? मन अब यह भरोसा चाहता है कि मैंने सही सवाल पूछ लिया, सही समझ ले ली, तो अब मेरी शांति सुरक्षित है। डर ने सिर्फ पता बदला, ग्रीन कार्ड से खिसक कर अब आत्म-निरीक्षण की ईमानदारी पर आ टिका। निश्चितता की भूख वही है, बस पकड़ने की चीज़ बदल गई। यह देखना किसी निर्णय पर पहुंच…















