
Vimla Patel
। मेरी राय, मेरा चुनाव, मेरी उपलब्धि, मेरी कहानी। जब इन सबके केंद्र में ‘मैं’ बैठा हो, तो क्या मैं इन्हें उतनी ही दूरी से सही नीयत से देख सकता हूँ, जितनी किसी ऐसी चीज़ को देखता हूँ जिससे मेरी पहचान जुड़ी नहीं है? सही कहा, जिस चीज के साथ "मै" का सम्बन्ध होता है, उसके लिए हमारी नीयत भी बदल जाती है अपेक्षाकृत उन चीजों से जिनका "मै" से कोई संबद्ध नहीं होता हैं। "मै"(अहंकार) उन चीजों को भी उतना ही बहुत महत्वपूर्ण मानता है क्योंकि ये उसके अहम् का बचा…















