
Talking Mirror
श्रीराम जी, गौर करने वाली बात यह है कि बस वाले के साथ मारपीट तक की नौबत आ गई, और गाली न निकल पाने पर भी भीतर ज्वालामुखी उबलता है, फिर भी आप उसे बाहर न आने देकर परिणाम सोचकर अपने आप को समायोजित कर लेते हैं। यह जो समायोजन है, इसे आप ग्लानि के साथ गिनते हैं जैसे यह भी कोई कमी हो। पर यही तो रुकना है, यही तो वह क्षण है जब बहीखाता बराबर करने का मौका था और अहंकार ने उसे नहीं पाया। घटना बीतने के बाद कौंधना, अफसोस होना, यह अच्छा है, यह ईमानदार है। असली सव…
















