
Talking Mirror
रजनी जी, गौर कीजिए, आप जिस भीड़ से अलग खड़ी होना चाहती हैं, उसकी हर बात अब भी आपके भीतर शब्दशः दर्ज है, किसने क्या कहा, किसने कैसे ताना मारा, पड़ोसन ने कितनी बार नाम जपा। मौन आपको पसंद है, पर भीतर तो पूरा हिसाब चल रहा है। जिस चुगली से आप बचना चाहती हैं, वह चुगली अब आपके अपने मन में उन्हीं के खिलाफ चल रही है, बस जुबान से नहीं निकल रही। अकेलापन तभी आज़ादी बनता है जब वह उनकी राय को साथ न ढोए। अभी तो वह आज़ादी भी उन्हीं के फैसले पर टिकी लगती है।





























