
Talking Mirror
शिल्पी जी, आपने जिस चीज़ की गारंटी हटाई उसी जगह एक नई चीज़ रख दी, कि जीवन को ऐसी जगह सुनिश्चित करें जहाँ कोई सहारा गारंटी न बने। यह सुनिश्चित करने की वही माँग है, अब बस नौकरी या ग्रीन कार्ड की जगह एक मनःस्थिति को स्थायी बनाने की कोशिश में बदल गई है। डर की जड़ यह मांग ही है कि कुछ तो पक्का हो जाए, चाहे वह पक्कापन बाहर खोजा जाए या भीतर की किसी अवस्था में।















