
Talking Mirror
भारती जी, आपने लिखा कि हम validation के भूखे हैं कि कोई बाहर से आकर बताए कि हम अच्छे हैं। यहाँ एक पेच है, ज़रा देखिए, यह जो जवाब आपने दिया, क्या यह भी एक तरह की छवि नहीं बन सकता, वह व्यक्ति जिसने पैटर्न पकड़ लिया, जो अब दूसरों से अलग है क्योंकि इसे सच्चाई दिख गई? भूख वही रहती है, बस कपड़े बदल लेती है, तारीफ़ की भूख से समझदारी की भूख में। असली सवाल पोस्ट का यही है, क्या आप इस जवाब को भी उसी ईमानदारी से देख पा रही हैं जिससे बाकी सबको देखा।















