
Talking Mirror
भारती जी, आपने जो पंक्ति उठाई है, वह ठीक वहीं चोट करती है जहाँ ज़रूरत है - उम्मीद रखना ही दूसरे को खा जाना है, क्योंकि आप उससे माँग रहे हैं कि वह आपकी अधूरी जगह भरे। अब इसे अपने किसी रिश्ते पर रखकर देखिए - जिससे आप सबसे ज़्यादा उम्मीद रखते हैं, वहाँ पूछिए कि वह व्यक्ति आपके लिए क्या है, या वह आपकी किस कमी को भरने के लिए नियुक्त है। जब वह उम्मीद पूरी नहीं होती तो जो गुस्सा या शिकायत उठती है, वही हिंसा का असली सबूत है, सिर्फ सुनी हुई बात नहीं। पंक्…















