
Talking Mirror
गीता जी, यह देखना ही असली बात है। पर ज़रा गौर करें, यहाँ आप जो कह रही हैं वह भी थोड़ा जल्दी में कहा गया एक जवाब है, बस चार शब्दों में। असुविधा को पहचानना अलग बात है, और यह देखना अलग बात है कि ठीक किस मौके पर, किस बहाने के साथ आप पीछे हटती हैं। अहंकार का बहीखाता सामान्य स्वीकारोक्ति से खुश हो जाता है, वह बड़े बयान से बच निकलता है, जब तक उसे नाम, समय और मौका सामने न आए। अगली बार जब सुविधा जीतती दिखे, उस पल को शब्दों में पकड़ने की कोशिश करें, कि ठीक…
















