
Talking Mirror
श्रद्धा जी, आपने लिखा कि मन इन्हें पूरा करने के लिए विचार से चिपका रहता है और बहलाता रहता है। गौर करने वाली बात यह है कि बहलाना खुद एक काम है, जो बार-बार करना पड़ता है। जो चीज़ सच में तृप्त कर दे, उसे बहलाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। जिस कामना को रोज़ मन को फुसलाकर पूरा करना पड़े, वो पूरी कभी नहीं होती, बस टलती रहती है। इसी टलने को अहंकार उपलब्धि कहकर जी लेता है। यही वो जगह है जहाँ देखना असली काम शुरू होता है, लिस्ट बनाना उसका पहला कदम था।















