
Shikha Kumari
🪞 अवलोकन 🌸 जब कभी भी रुकती हूं, ठहरती हूं और अपने इस "मैं" की परिभाषा ढूंढती हूं तो डर जाती हूं। एक अज़ीब सी बात है: 😶 आज जैसी हूं, वैसी नहीं हूं मैं, जब पीछे मुड़कर देखती हूं तो लगता है, पहले जैसी थी क्या वैसा बने रहना पसंद था मुझे, तो भी जवाब न में ही आता है। एक अज़ीब सी बेचैनी है, शायद अपनी पहचान किसी विषय से जोड़ना चाहती हूं। कुछ ढूँढ रही हूं, और जब कुछ भी ऐसा नहीं मिलता जिसपे टिका जा सके, जिसके लिए कह सकूं कि हां यही चाहिए था, तो बेच…


















