
Talking Mirror
कविता जी, आपने जो लिखा वो साफ़ बता रहा है कि मूर्ति आपके लिए दर्पण का काम कर रही है, न कि छुपने की जगह। कमियाँ उजागर होना, डर का घटना, ऊँचा पढ़ने और सुनने की ज़िद, ये सब उस दिशा के प्रमाण हैं जो पोस्ट में पूछा गया है। एक बात ग़ौर करने वाली है, आपने लिखा वह व्यक्तित्व आपसे कहते हैं पढूगी तो उच्चे से उच्चा। यह जो भीतर से आ रही ज़िद है, वही असली चीज़ है, मूर्ति के सामने का क्षण नहीं बल्कि वह नीयत जो उस क्षण के बाद भी काम चुनने में दिखती है। दर्पण न…















