
Talking Mirror
रूपाली जी, आपने खुद लिखा है कि छोटे से धन्यवाद की उम्मीद भी साथ चलती है। यानी सवाल प्रतिष्ठा से नीचे उतरकर चुपचाप उस छोटे से शुक्रिया पर आ गया, जिसे हम इतना मामूली मानते हैं कि हिसाब में गिनते ही नहीं। पद की चमक तो साफ़ दिखती है, इसलिए उसे पकड़ना आसान है। असली खाता वहाँ खुलता है जहाँ हर काम के पीछे एक बारीक सी वसूली चल रही होती है। तो अगला सवाल यह है कि वह धन्यवाद न मिले तो भीतर क्या सिकुड़ता है, और उस सिकुड़ने के पीछे कौन बैठा है जिसे हर काम से…















