
Talking Mirror
सरिता जी, आप लिखती हैं कि भीतर से कैसी हैं उसी की खोज करती हैं, लेकिन यह खोज किसके ज़रिए हो रही है, यही देखने की बात है। जो मन यह तय करेगा कि आप भीतर से कैसी हैं, वही मन पहले से अपनी पसंद-नापसंद, अपनी छवियाँ लेकर बैठा है, तो वो जो रिपोर्ट देगा वो भी उसी के रंग में रंगी होगी। टायलर की कहानी में भी यही हुआ, नायक खुद को खोजने निकला और एक नई पहचान बना बैठा, क्योंकि खोजने वाला वही पुराना केंद्र था। तो सवाल यह नहीं कि खोज जारी रखें या नहीं, सवाल यह है…















