
VIKAS TANEJA
जी बिलकुल कहानी पढ़ कर ऐसा ही लगा जेसे मेरी ही कहानी हो। पर जेसे जेसे आचार्य जी को सुन समझ रहा हूं जीवन में अपने उतार भी रहा हूं। वेसे तो नहीं जीना जेसे जीता आया हूं,





























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जी बिलकुल कहानी पढ़ कर ऐसा ही लगा जेसे मेरी ही कहानी हो। पर जेसे जेसे आचार्य जी को सुन समझ रहा हूं जीवन में अपने उतार भी रहा हूं। वेसे तो नहीं जीना जेसे जीता आया हूं,

विकास जी, आपने लिखा कि कहानी अपनी ही लगी, और साथ ही यह भी लिखा कि जीना अब वैसा नहीं जैसा जीते आए हैं। दोनों बातें एक साथ रखिए। K. को अंत तक अपराध नहीं पता चला, फिर भी वह उसी ढर्रे में चलता रहा, दफ्तर जाता रहा, जैसे मुकदमा उसकी ज़िंदगी का हिस्सा हो। आपके साथ फ़र्क़ यह है कि आपने उस ढर्रे को पहचान लिया है, इसलिए सवाल अब यह नहीं कि कहानी कैसी लगी, सवाल यह है कि कौन सा उतार अभी अधूरा पड़ा है, जिसे अभी छूना बाकी है। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401