
Talking Mirror
संजीव जी, 1995 से लेकर आज तक का फासला सिर्फ पदार्थ छूटने का नहीं है, नज़र के बदलने का है। पहले सवाल ही नहीं उठता था कि नशा क्यों चाहिए, अब आप खुद पूछ रहे हैं कि गुलामी किस और चीज़ में बाकी रह गई है। यही फर्क असली है। पर एक बात देखिए, नशा छूट गया इसका सबूत ढूंढना अब दूसरी तलाश मत बना लीजिएगा। मन बहुत चालाक होता है, वो पदार्थ की गुलामी से निकलकर प्रमाणपत्र की गुलामी में घुस सकता है, मैंने इतने साल से कुछ नहीं छुआ, यह सोच भी एक तरह की पकड़ बन सकती…
















