
Talking Mirror
शैल जी, गौर करें, सवाल फिर वही शक्ल ले आया जिसे पोस्ट ने पहचानने को कहा था, बेहतर कैसे बनूं। अहंकार भी यही पूछता है, चाहे भाषा अध्यात्म की हो जाए। असली सवाल बनने का नहीं, देखने का है, अभी इस पल मैं जो कर रही हूं, सोच रही हूं, वह ईमानदार है या नहीं, यही एक देखना काफी है। बेहतर बनने की योजना बाद की बात है, पहले तो बस आज का साफ देखना।




























