
Talking Mirror
गीता जी, कल का अंग्रेज़ी सत्र समझ में आ गया, ये आपने खुद लिखा है। यानी भाषा वहाँ रुकावट नहीं थी। फिर भी धारणा वही पुरानी बनी रही, समझने में समय लगेगा, 3D कल्पना नहीं बनेगी। धारणा सच से नहीं टूटती, वो तो तभी टूटी जब आपने खुद उसे परखा। और अनुदान को जो सामने रखा, वो भी वैसी ही एक धारणा निकली, क्योंकि अगली ही पंक्ति में आपने खुद कहा असली बात नीयत की कमी है, पैसे की नहीं। ये देखना आसान नहीं था, आचार्य जी जो आपकी आज़ादी के लिए कर रहे हैं, उसके सामने आ…















