
MRIDULA
जिस सेवा में खुद को बनाए रखने की चाहत होगी वह सेवा सृजनात्मक नहीं हो सकती है क्योंकि हमने जिनको सेवा के लिए चुना उसे स्वयं से पृथक समझ लिया तभी तो हमें सेवा के बदले कुछ पाने की लालसा हुई। किसी भी कृत्य में जब तक मैं बना रहेगा वह कर्म सार्थक या निष्काम हो ही नहीं पाएगा बस कुएं से निकलकर तालाब में समाप्त उस कार्य की और कर्ता की यही अवकात होगी। हमें इन महापुरुषों से प्रेरित होकर अपने अहंकार को निरंकार बनाने का यत्न करना चाहिए।




























