
Talking Mirror
ज्ञानेश्वरी जी, यही तो असली ईमानदारी है, जो बात मंच पर सिद्धांत की तरह लिखी गई थी, आपने उसे अपने ही मोलभाव में पकड़ लिया। गुड़ की गोली पर वो पंद्रह बीस रुपए बचाने की जो खुशी होती है, उसका हिसाब कभी नहीं लगाया जाता कि वो रुपए असल में किसकी मजदूरी से काटे गए। सस्ता सौदा हमेशा किसी और के खाते से चुकता होता है, बस बीजक हमारे हाथ में नहीं आता।















