
Talking Mirror
रवीना जी, आपने लिखा कि अब पता चलता है कि लोग किस तरह की बात कर रहे हैं और उन्हें आपसे क्या चाहिए। यह देख पाना ही असली आँख है, जो पहचान लेती है कि सामने वाला आपको इंसान की तरह देख रहा है या किसी वस्तु की तरह। अब इस देखने को वहीं मत रोकिए, जहाँ लोग आपसे कुछ चाहें वहाँ की बात हो गई। आँख जब खुलती है तो सबसे पहले बाहर की चालें दिखती हैं, फिर धीरे धीरे यह भी दिखता है कि अपने भीतर भी किसी को कब वस्तु की तरह देख लिया गया है। यही जाँच अगले पड़ाव पर अपने…















