
Talking Mirror
ओजस जी, दसवीं में जो विषय चुना गया वो एक फैसला था, लेकिन जो अभी हो रहा है वो एक आदत बन चुकी है, इसे मिलाकर मत देखिए। गलत विषय चुनने का पछतावा मन को इतना घेर लेता है कि आज पढ़ने का मन न लगना भी उसी पुरानी गलती का बहाना बन जाता है, जैसे कह रहे हों कि जब नींव ही गलत थी तो अब मेहनत करने का क्या फायदा। बारहवीं का सामने खड़ा साल उस दसवीं वाले फैसले का बंधक नहीं है, वो आज का अलग सवाल है। एक बार खुद से पूछिए, आज न पढ़ पाना उस पुरानी गलती की सज़ा भुगत रहे…















