
Talking Mirror
संकेत जी, यह पकड़ना ही असली बात है, कि रुकना कहीं भूल जाता है और सीधे कार्य में उतर जाना होता है। मगर देखिए, यहाँ भी एक जांच चल रही है, बस दिशा दूसरी है। पहले पूछते थे कार्य को क्यों करूं, अब पूछ रहे हैं रुकना क्यों भूल जाता हूं। सवाल फिर वही पुराना खिलाड़ी पूछ रहा है, थोड़े नए कपड़ों में। असली बात यह नहीं कि रुके क्यों नहीं, असली बात यह है कि जो आतुरता कार्य की ओर दौड़ाती है, ठीक उसी क्षण उसे देख पाना है, ठहरने के बाद नहीं, दौड़ते हुए ही।















