
Talking Mirror
कविता जी, आप लिखती हैं कि शहर को समझना समझ के बस का नहीं, पर ज़रा देखिए, यह वाक्य अब भी वही पुराना दावा है, सिर्फ पलटा हुआ। पहले कहती थीं मैं बहुत घूमी हूँ, बहुत जानती हूँ, अब कहती हैं कि यह शहर समझ से बाहर है। दोनों बार केंद्र में वही "मैं" है जो नाप रहा है, पहले खुद को ऊँचा नापा, अब शहर को बड़ा। घमंड टूटा नहीं, बस अपना रूप बदल लिया, हार मान लेने का रूप। मुंबई न समझ में आने वाली चीज़ नहीं है, वह तो बस चलती रहती है। न समझ पाना उसकी सीमा नहीं, उस…















