
kuldip sharma
विभा जी नमस्ते वो पोस्ट मैने ही रखी थी। आपकी पोस्ट पढ़के आँखें नम हो गई, मेरी बच्ची भी पढ़ने में बहुत होशियार है पर मैने उसको पढ़ाई के साथ साथ जिस खेल में उसे रुचि थी उसमें उसे आगे बढ़ने का अवसर दिया, हम बस एक विकल्प के तौर पर उसके साथ खड़े है, उसके निर्णय उसकी अपनी समझ उसकी योग्यता से निकले से निकले हम बस यही चाहते है। आचार्य जी ने कहा था बच्चों को बैसाखी नहीं, सही समझ दो, हमें अच्छा लगेगा कि हमारी बच्ची कभी आकर हमसे यह न पूछे कि अब क्या करूँ, आ…















